बोकाखात का 'शांति घाट' में अशांति—अंतिम यात्रा बनी नर्क की राह, कचरों के ढेर से काजीरंगा पर भी खतरा :

बोकाखात का 'शांति घाट' में अशांति—अंतिम यात्रा बनी नर्क की राह, कचरों के ढेर से काजीरंगा पर भी खतरा :
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Aiidesh News: 30 April - 2026 : 

कैलाश पटवारी, बोकाखात : 

जीवन की अंतिम यात्रा जिस स्थान पर पूर्ण होती है, उसे 'शांति घाट' कहा जाता है। लेकिन बोकाखात का शांति घाट वर्तमान में अपनी बदहाली और गंदगी के कारण 'अशांति' का केंद्र बन गया है। यहाँ की स्थिति इतनी नारकीय हो चुकी है कि शव यात्रियों के लिए यहाँ दो पल रुकना भी दूभर हो गया है।

डंपिंग ग्राउंड बना मौत का जाल, 

बोकाखात नगर पालिका द्वारा श्मशान के ठीक बगल में बनाए गए डंपिंग ग्राउंड ने पूरे वातावरण को जहरीला बना दिया है। कचरे से उठने वाली भीषण दुर्गंध के कारण शव यात्रियों का दम घुटने लगता है। हालात इतने बदतर हैं कि यहाँ आने वाले लोगों को सांस लेने में भारी तकलीफ होती है, जिससे किसी गंभीर स्वास्थ्य हादसे की आशंका बनी रहती है। विडंबना यह है कि जिसे 'अत्याधुनिक कचरा निस्तारण केंद्र' के रूप में प्रचारित किया गया था, वह आज पूरी तरह विफल साबित हो रहा है।

काजीरंगा के अस्तित्व पर संकट, 

यह क्षेत्र नुमालीगढ़ रिफाइनरी के 'पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र' (Eco-Sensitive Zone) के अंतर्गत आता है। बारिश होते ही इस डंपिंग ग्राउंड का दूषित पानी सीधे 'डिफ़लू नदी' में मिल रहा है। ज्ञात हो कि डिफ़लू नदी काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की जीवन रेखा है। इस दूषित पानी के बहाव से विश्व प्रसिद्ध काजीरंगा के वन्यजीवों और पर्यावरण पर गंभीर खतरा मंडराने लगा है। हैरानी की बात यह है कि पर्यावरण संरक्षण की दुहाई देने वाला नुमालीगढ़ रिफाइनरी (NRL) प्रबंधन इस गंभीर मुद्दे पर मौन साधे हुए है। श्मशान के सौंदर्यीकरण के नाम पर रिफाइनरी ने 2 करोड़ रुपये की योजना तो बनाई थी, लेकिन धरातल पर वह राशि कहाँ खर्च हुई, इसका पता नहीं। आज वह पूरा क्षेत्र केवल झाड़ियों और जंगल में तब्दील हो चुका है। एक कड़वा सवाल

श्मशान जीवन का अंतिम तीर्थ है। क्या जीवित समाज अपने और अपनों की गरिमामय अंतिम यात्रा के लिए इस बदहाली के खिलाफ आवाज उठाएगा? प्रशासन की इस अनदेखी ने न केवल मानवीय संवेदनाओं को ठेस पहुँचाई है, बल्कि प्रकृति के अनमोल उपहार काजीरंगा को भी विनाश की कगार पर खड़ा कर दिया है।

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